ना जाने क्यूँ…

ना जाने क्यूँ उलझी हैं कुछ बातें जहन में मेरे
ना जाने क्यूँ अटकी हैं कुछ साँसे सीने में मेरे

रह-रह कर चुभती हैं वो बातें जहन मेरे
कुछ तो अब भी बाकी है इसीलिए शायद
अब भी अटकी हैं कुछ साँसे सीने में मेरे

पल-पल हर पल ये सोचा करता हूँ
क्यूँ ये बातें उलझी हैं जहन में मेरे
क्यूँ ये अटकी है साँसे सीने में मेरे

उलझने

उलझने उलझी हैं जहन मे मेरे… साँसे अटकी है सीने मे मेरे…

ना तो उलझने सुलझती हैं… ना ही साँसे निकलती हैं…



जब -जब चाहा

तब-तब पाया,

तू तो मेरे साथ ही था…

नाहक ही मैं भटका,

जब तू मेरे साथ ही था…

जब -जब चाहा

तब-तब पाया….



सारी-सारी रात जगाती हैं तनहाइयाँ मुझे|

अक्सर कुछ इस तरह से तड्पाती हैं मुझे|  

ना कुछ करने देती हैं अब तनहाइयाँ मुझे|

हक़ समझ अपना हर-बार तड्पाती हैं मुझे| 

चाहता हूँ सोना मैं उम्र भर के लिए मगर|

नींद में भी आकर जगाती हैं तनहाइयाँ मुझे| 

अक्सर कुछ इस तरह से तड्पाती हैं मुझे|

झिझक अब अपनी मिटाने की कसम खाता हूँ|

कैसे भी कर के ये उनको बताने की कसम खाता हूँ|

रह जाता हूँ हर-बार उलझ कर उलझनों में जिनकी|

ना जाने कैसी ये उनको बताने  कसम खाता हूँ|

झिझक अब अपनी मिटाने की कसम खाता हूँ|

आज फिर तेरी…



आज फ़िर तेरी याद आयी

कुछ आँसू कुछ यादें साथ लायी

नहीं चाहता था मैं याद करना तुझे

मगर फ़िर भी तेरी याद आयी

कुछ आँसू कुछ यादें साथ लाई

सालों का क्या है ये तो आते-जाते रहते हैं

एक जाता है तो दूसरा आता है

बस इसी तरह से यादें हैं

एक जाती है तो दूसरी आती है

कुछ ख़्वाब थे आँखो मैं मेरे

कुछ ख़्वाब होंगे तुम्हारी भी आँखो मैं शायद

क्यूंकी रिश्ता ही ख्वाबों का कुछ ऐसा ही आँखो से है

जैसे खुशबू का फूल से पानी का प्यास से

प्यास तो बुझ जाती है पानी से मगर

तेरी याद बुझती है तेरे आने से

बस इसीलिए आज फिर तेरी याद आयी

कुछ आँसू कुछ यादें साथ लायी

आज फिर तेरी याद आयी….



मेरा रिश्ता है उनसे कुछ ऐसा…


मेरा रिश्ता है उनसे कुछ ऐसा
फूलों का खूशबू से जैसा
आँखो का आसुओं से जैसा
प्यास का पानी से जैसा
बस मेरा रिश्ता है उनसे कुछ ऐसा

कई बार कोशिश की थी
भुलाने की उनको
मगर ये मुमकिन ना हुआ
हर बार कि तरह इस बार भी
नाकामयाब भी हुआ

फिर भी करता हूँ कोशिश
हर बार भुलाने की उनको

जानकर भी कि ना जाने क्यूँ

मेरा रिश्ता है उनसे कुछ ऐसा
फूलों का खूशबू से जैसा
आँखो का आसुओं से जैसा
प्यास का पानी से जैसा
बस मेरा रिश्ता है उनसे कुछ ऐसा

उलझने दो मुझे…

उलझने दो मुझे उलझनों मे
अनचाही परेशानियों मे
उन गेशुओं के घने अंधेरो मे
इन दिन के सुर्ख उजालों मे
अब ये सब बड़े ही अच्छे लगते हैं
ना जाने क्यूँ उजाले चुभते हैं
एक अज़ीब सा कड़वा ही सही
 कुछ-कुछ मीठा सा लगता है
अब तो आदत सी हो गयी है
जब-जब ये कड़वा सा लगता है

उलझने दो मुझे उलझनों मे

अनचाही परेशानियों मे
उन गेशुओं के घने अंधेरो मे
इन दिन के सुर्ख उजालों मे…


सुलगने लगा है…

सुलगने लगा है

सीने मे कुछ तो मेरे

क्या करूँ किससे कहूँ

कब से सुलग रहा है

वो सवाल सीने मे मेरे

कुछ तो करूँ

किसी से तो कहूँ

अब ये बात तो मैं

होने लगी है

एक तक़लीफ़ सी

अब जीने मे मुझे

साँस लेने मे मुझे

आँच सी लगती है

सीने मे मुझे

क्या करूँ किससे कहूँ

अब ये बात मैं

 

पिघलने लगा है

कुछ दिनो से

वो सवाल सीने मे मेरे

मज़ा सा आने लगा है

अब जीने मे मुझे

बुझने लगी है

सुलग रही आग

अब सीने मे मेरे

पिघलने लगा है

वो सवाल अब

सीने मे मेरे

मज़ा सा आने लगा है

अब जीने मे मुझे

नादान था मैं नही…

नादान था मैं नही जानता था ये क्या कर रहा था
उन हवाओं को पकड़ने की कोशिश कर रहा था
सोचता था शायद उन हवाओं मैं खुशबू हो तुम्हारी
बस यही सोचकर पकड़ने की कोशिश कर रहा था
नादान था मैं नही जानता था ये…….

Stop censorship